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एकलव्य छात्राओं का पैदल मार्च: प्राचार्य हटे, अधीक्षिका को नोटिस; लेकिन सवाल-3 महीने बिजली गुल थी तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई?

अंबिकापुर। सरगुजा जिले के बतौली विकासखंड स्थित कन्या एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय शिवपुर की छात्राओं को अपनी समस्याएं बताने के लिए कलेक्टर से मिलने पैदल निकलना पड़ा। 7 सितंबर को करीब 50 छात्राएं विद्यालय से अंबिकापुर की ओर पैदल मार्च पर निकल गईं। रास्ते में प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें रोकने और समझाने का प्रयास किया, लेकिन छात्राएं कलेक्टर से मिलकर अपनी समस्याएं बताने पर अड़ी रहीं। बाद में उन्हें बस से अंबिकापुर लाया गया, जहां उन्होंने कलेक्टर के सामने अपनी शिकायतें रखीं।

घटना सामने आने के बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने मामले को गंभीरता से लिया और सरगुजा कलेक्टर से फोन पर जानकारी लेकर पूरे मामले की जांच तथा जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बच्चों को अपनी मूलभूत समस्याओं के समाधान के लिए विद्यालय से बाहर निकलकर पैदल जाना पड़े, यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने बिजली, पढ़ाई, मेस और साफ-सफाई सहित सभी व्यवस्थाएं तत्काल दुरुस्त करने के निर्देश दिए।

प्राचार्य हटे, अधीक्षिका को नोटिस

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद जिला प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच के मद्देनजर विद्यालय के प्राचार्य ओम नारायण श्रीवास्तव को आगामी आदेश तक सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास कार्यालय में अटैच कर दिया गया है।

वहीं PGT अंग्रेजी प्रतीक्षा त्रिपाठी को विद्यालय के प्राचार्य का दायित्व सौंपा गया है। PGT हिंदी अरविंद अशोक तिग्गा को उनके मूल पदस्थ विद्यालय मैनपाट के लिए कार्यमुक्त किया गया है।

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छात्रावास अधीक्षिका आयुषी सोनी को शासकीय कार्य में लापरवाही और उदासीनता बरतने के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। साथ ही विद्यालय के अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन भुगतान को कलेक्टर एवं जिला स्तरीय समिति के अनुमोदन से जोड़ा गया है।

जांच समिति करेगी पूरे मामले की पड़ताल

छात्राओं के पैदल मार्च और विद्यालय की समस्याओं की जांच के लिए संयुक्त कलेक्टर सरगुजा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई है।

जांच समिति ने विद्यालय पहुंचकर छात्राओं और कर्मचारियों से जानकारी ली है। प्रशासन अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि विद्यालय में समस्याएं कितने समय से थीं, शिकायतें किस स्तर पर की गईं और उनके समाधान के लिए जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा क्या कार्रवाई की गई।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल- छात्राओं को पैदल निकलने की नौबत क्यों आई?

प्रशासन की कार्रवाई के बाद एक सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है—अगर विद्यालय में समस्याएं लंबे समय से थीं तो उनका समाधान छात्राओं के पैदल मार्च के बाद ही क्यों शुरू हुआ?

छात्राओं ने प्रशासन के सामने जो शिकायतें रखीं, उनमें करीब तीन महीने से बिजली नहीं होने, शिक्षकों द्वारा ठीक से पढ़ाई नहीं कराने और भोजन कक्ष में साफ-सफाई की खराब स्थिति जैसी बातें शामिल हैं।

यानी सवाल केवल यह नहीं है कि छात्राएं पैदल क्यों निकलीं, बल्कि सवाल यह भी है कि उनकी शिकायतें विद्यालय स्तर पर क्यों नहीं सुनी गईं?

अगर तीन महीने से बिजली की समस्या थी, तो इसे ठीक कराने के लिए जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे?

अगर छात्राओं को पढ़ाई से जुड़ी शिकायत थी, तो संबंधित शैक्षणिक व्यवस्था की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?

और अगर मेस व साफ-सफाई को लेकर समस्या थी, तो हॉस्टल व्यवस्था की नियमित मॉनिटरिंग क्यों नहीं हुई?

अधीक्षिका पर कार्रवाई जायज, लेकिन जिम्मेदारी सिर्फ यहीं तक?

छात्रावास अधीक्षिका को कारण बताओ नोटिस दिया जाना व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम है। लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि बिजली, भोजन, साफ-सफाई और शैक्षणिक समस्याएं लंबे समय से बनी हुई थीं, तो यह सवाल भी उठेगा कि ऊपरी स्तर पर निरीक्षण और निगरानी करने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे?

एक आवासीय विद्यालय में बच्चे 24 घंटे संस्थान की व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में बिजली, भोजन, स्वच्छता, शिक्षक और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं केवल किसी एक कर्मचारी की जिम्मेदारी नहीं हो सकतीं।

मंत्री ने भी मांगी रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के आदिम जाति विकास मंत्री रामविचार नेताम ने भी मामले को लेकर विभागीय अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी है। उन्होंने यह जानने की बात कही है कि छात्र-छात्राओं को अपनी समस्याओं के लिए पैदल मार्च करने की स्थिति क्यों बनी और लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है।

अब कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है जवाब

इस पूरे मामले में प्रशासन ने छात्राओं के पैदल मार्च के बाद तेजी दिखाई है। प्राचार्य को हटाया गया, अधीक्षिका को नोटिस दिया गया और जांच समिति गठित हुई।

लेकिन असली सवाल अब यह है कि क्या जांच केवल स्कूल के तत्काल जिम्मेदार कर्मचारियों तक सीमित रहेगी या उन अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी, जिन्हें समय रहते इन समस्याओं की जानकारी लेकर समाधान सुनिश्चित करना था?

क्योंकि यदि बच्चों को अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए स्कूल से कलेक्टर कार्यालय तक पैदल मार्च करना पड़े, तो यह केवल विद्यालय प्रबंधन की विफलता नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल है।

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रुपेश चन्द्रवंशी

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लेखक/संपादक BJMC (Bachelor of Journalism & Mass Communication) डिग्रीधारी एवं 12 वर्षों से अधिक के मीडिया अनुभव के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ... Read More

लेखक/संपादक BJMC (Bachelor of Journalism & Mass Communication) डिग्रीधारी एवं 12 वर्षों से अधिक के मीडिया अनुभव के साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस दौरान प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब मीडिया में पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया है।

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